Suraj Prakash
 
मैं बहुत अरसे तक इस भ्रम में रहा कि मैं औरों से बेहतर इन्सान हूं। सही समझ रखता हूं, सही वक्त पर सही फैसले करता हूं और संतुलित जीवन जीता हूं। मैं ये भी मान कर चलता रहा कि मैं टुच्चा तो नहीं ही हूं बेशक कुछेक कमज़ोरियां मुझ में रही हों। मैं इस मु्गालते में भी रहा कि जिस तरह मैं अपनी निगाह में बेहतर इन्सान हूं, दूसरों की निगाह में भी मैं उतना ही श्रेष्ठ, बेहतरीन और अनुकरणीय हूं।
हम अक्सर दर्पण नहीं देखते इसलिए अपने आपको बहुत कम पहचानते हैं। और कहीं हमें दर्पण देखने की लत लग जाये तो हम अपने आपको इतना ज्यादा जानने-पहचानने लगते हैं कि अपने और सिर्फ अपने बारे में घंटों, दिनों और महीनों तक अच्छी अच्छी बात करते रह सकते हैं। भला हमारी निगाह में हमसे बेहतर कथा नायक कौन हो सकता है। दोनों ही स्थितियों में हम खुद भी अंधेरे में रहते हैं और सामने वाले को भी अंधेरे में रखते हैं।

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